तिफ़्ल – ए – सिराज हूँ ज़िंदगी

(एक ग़ज़ल)

गर ज़ीस्त ग़मजदा है तो क्या

दर्द का आईना है तो क्या

तिफ़्ल – ए – सिराज हूँ ज़िंदगी मैं भी

हर तरफ़ आँधियाँ हैं तो क्या ।

बयाँ करने की चाहत है

नहीं रूह – ए – बयाँ है तो क्या

दफ़्न किये हैं मैंने ख़्वाबों के शोर कहीं

ये कूचा – ए – तन्हाइयां हैं तो क्या।

इस वीराना – ए – दिल में भी होगी

बू – ए – गुल – ए – मोहब्बत कहीं

हर तरफ़ क़हत की बर्बादियाँ हैं तो क्या।

अब्र – दीदा ना होना

कि नहीं बरसी है शबनम अभी

ये तो इब्तिदा – ए – ज़वाल है बस

इंसिराम – ए – ज़िंदगी है क्या… ।

[ ज़ीस्त – life , तिफ़्ल – child, सिराज – lamp/candle, कूचा – street, बू – ए – गुल – ए – मोहब्बत – smell of the love flower, क़हत – famine, अब्र – दीदा – teary eyed, शबनम – dew, इब्तिदा – ए – ज़वाल – start of the sundown, इंसिराम – ए – ज़िंदगी – conclusion of life ( death ) ]

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कुछ हाइकू

दरख़्त
हाथ फैले हैं चारों ओर

सुंदर हरी साड़ी भी है

उसके बदन पर सजी

खूबसूरत है वो दरख़्त नीम का ।

माँ की चाय

गर्म है और मीठी सी है

दिल तक गहरी

उतर जाती है

वो चाय माँ के हाथों की

वो सर्दी की धूप

बात तब की है जब मेरी उम्र सात साल रही होगी। हम जहाँ रहते थे वहाँ आस-पास में कई घर थे — बिल्कुल सटे-सटे। मेरे घर के ठीक पड़ोस में मेरी बुआ की सहेली का घर था। हमारा उस घर में आना जाना लगा रहता था। अक्सर शाम में मैं और मेरी बुआ उनके घर जाते थे और मजे से कैरम और लूडो खेलते थे। डॉली नाम था उनका, साथ ही उसकी एक बहन भी थी – गुड्डी।

दोनों बहनों का असली नाम तो पता नहीं पर सब उन्हें यही बुलाते थे। उस समय दोनों बहनें कुँवारी थीं। गुड्डी बड़ी बहन थी और डॉली छोटी; दोनों बहनें मेरी मंझली और छोटी बुआ के साथ एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। स्वभाव से बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थीं दोनों, और खूब गप्पें लड़ाती थीं। उनके साथ मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वे दोनों मेरी बुआ नहीं, बल्कि उनकी सहेलियाँ हैं। हम सब अक्सर शाम में बगल के बागीचे में बैडमिंटन खेला करते थे। पर असली मजा तो जाड़े के मौसम में आता था…..

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हम क्रिसमस की छुट्टियों में, जब स्कूल बंद हुआ करता था उनके छत पर मजे से धूप सेंकते थे। वहीं पर बगल में बैठकर मेरी दादी और गुड्डी बुआ की माँ सलाई पर स्वेटर बुनने के लिए फंदे डाला करती थीं। वैसे मुझे स्वेटर बुनना तो नहीं आता था, पर उनका सलाई चलाना बहुत भाता आता था; मैं अक्सर उन्हें बड़े ध्यान से बुनाई करते देखती थी। जब उन्हें आभास हुआ कि मेरा भी सलाई पर स्वेटर बुनने का मन करता है, तो दादी ने मुझे भी एक सलाई पर कुछ फंदे बुनकर दे दिया बुनने के लिए… ।

और फिर तो मुझे जैसे मन-माँगी मुराद मिल गई। बेफिक्र सी मैं छत के एक कोने में जाकर कुछ बेतरतीब सा बुनने लगी। उधर दूसरी ओर मेरी दादी, बुआ और उनकी सहेलियाँ मुझे देख-देखकर मुस्कुरा रही थीं।

लेकिन घंटे भर बाद ही मेरा मन ऊब गया और मैं फिर मुंडेर से गली में झाँकने लगी। और मेरी बुआ और बाकी लोग धूप सेंकने में व्यस्त हो गये। थोड़ी देर बाद ही मैं भागते हुए वापस आकर उनके पास बैठ गई।
पर आखिरकार कुछ दिनों में मुझे भी बुनना आ ही गया। और पहली बार जब मैंने अपनी गुड़िया का स्वेटर बुना, तो सबको बार-बार दिखाती रहती थी।

आह वो भी क्या ख़ूब दिन थे। बचपन का अल्हड़पना, वो बेफिक्री… अब तो बस यादें ही रह गई हैं, जो होठों पे एक मुस्कान और आँखों के कोने में पानी की एक बूँद का तोहफ़ा दे जाती हैं। अब तो दादी का भी इंतकाल हो गया और गुड्डी बुआ से मिले बरसों हो गए… पर यादें… आह, दिल के किसी कोने में एक आशियाँ बना कर जमीं हैं, और रह रह कर अपने होने का एहसास दिलाती रहती हैं… ।

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