जीवन बने कल्पवृक्ष तुम्हारा

कल्पवृक्ष बना लो जीवन,
सब की आशा पूर्ण करो!
मित्र को अपने पास तो रखो,
शत्रु को भी ना दूर करो…

चाहे तुम जिस पथ से गुजरो,
प्रेम रस भरपूर भरो;
संगी हो या चाहे शत्रु,
नहीं किसी का अहित करो।

दीप बनाकर अपना जीवन,
जग अंधियारा दूर करो।
बने आदर्श तुम्हारा जीवन,
हे! कर्म तुम ऐसे वीर करो।

महावीर हो तुम, अहो!
देखो ना यूँ अधीर बनो।
कर्म – भूमि है तुम्हारा जीवन
अरे, जगत उद्धार करो।

प्रखर सूर्य बन जाओ, अहो!
विश्व कालिमा दूर करो।
हार ना मानो वीर – प्रवर!
कष्ट जगत के दूर करो।

बना कुटुंब जगत को स्वयं का,
जीव – मात्र कल्याण करो।
कल्पवृक्ष बना लो जीवन,
सब की आशा पूर्ण करो।

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मत आना इस दुनिया में बेटी

(यह कविता उन सभी लड़कियों के लिए है जिन्होने अपने जीवन में किसी तरह के अत्याचार सहे और/या उनका बहादुरी से सामना किया।)

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(Photo Courtesy Google)

मत आना तू दुनिया में बेटी,
कि यहाँ हर तरफ भेड़िये भरे हैं।

तेरे जनम से पहले ही
तेरे आने की खबर से हाय-तौबा मचाए हैं।
ये चाहते ही नहीं कि तू
इस दुनिया में आये,
इसलिए ये हमेशा नई नई मशीनें
इज़ाद करते रहे हैं।

तेरे गर्भ में रहते में तेरी माँ को
सताते रहते हैं।
उसे बरगलाते डराते हैं,
तुझे मारने को कहते हैं।

तेरी दादी चाहे तेरे पापा
कोई नहीं तुझे चाहता है,
तिस पर उन्हे मुझे सताने में
बहुत मजा आता है।

पर मुझे तो तुझमें अपनी
परछाईं नजर आती है,
पर कैसे समझाऊँ दुनिया को?
उन्हे यह बात नजर नहीं आती है।

इतनी मुसीबतों के बावजूद
है आखिर तेरा जन्म हुआ,
पर इतने पर भी तेरा दर्द
नहीं अभी है खत्म हुआ।

भले ही तू अभी नवजात है,
पर वहशी राक्षसों की अनगिन
भूखी नजरें तुझपे गड़ी हैँ।
वे भेड़ियों गिद्धों की तरह
तुझे नोचना चाहते हैं।

मैं तुझे बचाने को अपनी
आँचल में छिपाये हूँ,
पर जब तू बड़ी होगी तब क्या होगा
मैं इससे और अधिक घबराई हूँ।

तुझे बड़े होने पर
इससे भी बड़े खतरे देखने हैं।

पता नहीं किस मोड़ पर
तुझे छेड़ा जाए या
तेरी  इज्जत को तार-तार
किया जाए।

इसलिए तो मैं तुझसे
बस यही कहूँगी
मत आना तू इस दुनिया में बेटी।