मैं कविता क्यों लिखूँ

कविता लिखना
भला क्या फायदा है
इसमें ?

अब वो वक्त तो रहा नहीं
कि ‘मेघदूत’ लिखकर के हम
‘कालीदास’ बन जाएंगे !

हो जाएँगे अमर
कविता के इतिहास में
लिखकर
दो कवित्त और एक चौपाई
या फिर कोई दोहा !
दो-चार शब्द, पंक्तियाँ
श्रृंगार रस में डूबी हुई
या
अलंकार से परिपूर्ण।

थोड़े ही कोई राजा
या दीवान
बना देगा हमें राज-कवि
फिर हो जाएगी चाँदी!
या फिर बन जाएंगे
‘प्रसाद’ या ‘बच्चन’
या ‘ग़ालिब’ या ‘खुसरो’।

कि लेखनी तलवार बनकर
लाएगी कोई क्रांति –
‘भगत’ या ‘बिस्मिल’ की तरह !

शायद ऐसा ना होगा
और ना बनेंगे हम
कोई क्लासिकी लेखक ;
और नाम अमर होगा
काव्य-जगत इतिहास में !

लेकिन फिर भी
मिलेगी आत्मिक शांति।

वादा किया कभी –
कि ये जो विधा है,
जो रस-अलंकार है,
उसे फैलाना है
सब तक
जब तक साँस रहेगी।

जलाए रखना है काव्य-दीप
स्वयं को स्नेह बनाकर !

रात की मल्लिका

आज सोते समय
लगा जैसे
एकाएक मेरे कमरे में भीनी सी
खुशबू फैल गई।

कुछ पल तो मैं अवाक् रही
फिर याद आया
अरे
मेरे आँगन से आ रही है
ये मदमाती गंध
रातरानी के फूलों से!!

“ओ रात की मल्लिका
क्या ख़ूब जलवे हैं तेरे!”

मन ही मन ये कहते हुए
धीरे से मैं
आ के लेट गई पलंग पर…!!