वो सर्दी की धूप

बात तब की है जब मेरी उम्र सात साल रही होगी। हम जहाँ रहते थे वहाँ आस-पास में कई घर थे — बिल्कुल सटे-सटे। मेरे घर के ठीक पड़ोस में मेरी बुआ की सहेली का घर था। हमारा उस घर में आना जाना लगा रहता था। अक्सर शाम में मैं और मेरी बुआ उनके घर जाते थे और मजे से कैरम और लूडो खेलते थे। डॉली नाम था उनका, साथ ही उसकी एक बहन भी थी – गुड्डी।

दोनों बहनों का असली नाम तो पता नहीं पर सब उन्हें यही बुलाते थे। उस समय दोनों बहनें कुँवारी थीं। गुड्डी बड़ी बहन थी और डॉली छोटी; दोनों बहनें मेरी मंझली और छोटी बुआ के साथ एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। स्वभाव से बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थीं दोनों, और खूब गप्पें लड़ाती थीं। उनके साथ मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वे दोनों मेरी बुआ नहीं, बल्कि उनकी सहेलियाँ हैं। हम सब अक्सर शाम में बगल के बागीचे में बैडमिंटन खेला करते थे। पर असली मजा तो जाड़े के मौसम में आता था…..

image

हम क्रिसमस की छुट्टियों में, जब स्कूल बंद हुआ करता था उनके छत पर मजे से धूप सेंकते थे। वहीं पर बगल में बैठकर मेरी दादी और गुड्डी बुआ की माँ सलाई पर स्वेटर बुनने के लिए फंदे डाला करती थीं। वैसे मुझे स्वेटर बुनना तो नहीं आता था, पर उनका सलाई चलाना बहुत भाता आता था; मैं अक्सर उन्हें बड़े ध्यान से बुनाई करते देखती थी। जब उन्हें आभास हुआ कि मेरा भी सलाई पर स्वेटर बुनने का मन करता है, तो दादी ने मुझे भी एक सलाई पर कुछ फंदे बुनकर दे दिया बुनने के लिए… ।

और फिर तो मुझे जैसे मन-माँगी मुराद मिल गई। बेफिक्र सी मैं छत के एक कोने में जाकर कुछ बेतरतीब सा बुनने लगी। उधर दूसरी ओर मेरी दादी, बुआ और उनकी सहेलियाँ मुझे देख-देखकर मुस्कुरा रही थीं।

लेकिन घंटे भर बाद ही मेरा मन ऊब गया और मैं फिर मुंडेर से गली में झाँकने लगी। और मेरी बुआ और बाकी लोग धूप सेंकने में व्यस्त हो गये। थोड़ी देर बाद ही मैं भागते हुए वापस आकर उनके पास बैठ गई।
पर आखिरकार कुछ दिनों में मुझे भी बुनना आ ही गया। और पहली बार जब मैंने अपनी गुड़िया का स्वेटर बुना, तो सबको बार-बार दिखाती रहती थी।

आह वो भी क्या ख़ूब दिन थे। बचपन का अल्हड़पना, वो बेफिक्री… अब तो बस यादें ही रह गई हैं, जो होठों पे एक मुस्कान और आँखों के कोने में पानी की एक बूँद का तोहफ़ा दे जाती हैं। अब तो दादी का भी इंतकाल हो गया और गुड्डी बुआ से मिले बरसों हो गए… पर यादें… आह, दिल के किसी कोने में एक आशियाँ बना कर जमीं हैं, और रह रह कर अपने होने का एहसास दिलाती रहती हैं… ।

©All Rights Reserved

Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: