तिफ़्ल – ए – सिराज हूँ ज़िंदगी

(एक ग़ज़ल)

गर ज़ीस्त ग़मजदा है तो क्या

दर्द का आईना है तो क्या

तिफ़्ल – ए – सिराज हूँ ज़िंदगी मैं भी

हर तरफ़ आँधियाँ हैं तो क्या ।

बयाँ करने की चाहत है

नहीं रूह – ए – बयाँ है तो क्या

दफ़्न किये हैं मैंने ख़्वाबों के शोर कहीं

ये कूचा – ए – तन्हाइयां हैं तो क्या।

इस वीराना – ए – दिल में भी होगी

बू – ए – गुल – ए – मोहब्बत कहीं

हर तरफ़ क़हत की बर्बादियाँ हैं तो क्या।

अब्र – दीदा ना होना

कि नहीं बरसी है शबनम अभी

ये तो इब्तिदा – ए – ज़वाल है बस

इंसिराम – ए – ज़िंदगी है क्या… ।

[ ज़ीस्त – life , तिफ़्ल – child, सिराज – lamp/candle, कूचा – street, बू – ए – गुल – ए – मोहब्बत – smell of the love flower, क़हत – famine, अब्र – दीदा – teary eyed, शबनम – dew, इब्तिदा – ए – ज़वाल – start of the sundown, इंसिराम – ए – ज़िंदगी – conclusion of life ( death ) ]

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कुछ हाइकू

दरख़्त
हाथ फैले हैं चारों ओर

सुंदर हरी साड़ी भी है

उसके बदन पर सजी

खूबसूरत है वो दरख़्त नीम का ।

माँ की चाय

गर्म है और मीठी सी है

दिल तक गहरी

उतर जाती है

वो चाय माँ के हाथों की

मैं कविता क्यों लिखूँ

कविता लिखना
भला क्या फायदा है
इसमें ?

अब वो वक्त तो रहा नहीं
कि ‘मेघदूत’ लिखकर के हम
‘कालीदास’ बन जाएंगे !

हो जाएँगे अमर
कविता के इतिहास में
लिखकर
दो कवित्त और एक चौपाई
या फिर कोई दोहा !
दो-चार शब्द, पंक्तियाँ
श्रृंगार रस में डूबी हुई
या
अलंकार से परिपूर्ण।

थोड़े ही कोई राजा
या दीवान
बना देगा हमें राज-कवि
फिर हो जाएगी चाँदी!
या फिर बन जाएंगे
‘प्रसाद’ या ‘बच्चन’
या ‘ग़ालिब’ या ‘खुसरो’।

कि लेखनी तलवार बनकर
लाएगी कोई क्रांति –
‘भगत’ या ‘बिस्मिल’ की तरह !

शायद ऐसा ना होगा
और ना बनेंगे हम
कोई क्लासिकी लेखक ;
और नाम अमर होगा
काव्य-जगत इतिहास में !

लेकिन फिर भी
मिलेगी आत्मिक शांति।

वादा किया कभी –
कि ये जो विधा है,
जो रस-अलंकार है,
उसे फैलाना है
सब तक
जब तक साँस रहेगी।

जलाए रखना है काव्य-दीप
स्वयं को स्नेह बनाकर !

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