रात की मल्लिका

आज सोते समय
लगा जैसे
एकाएक मेरे कमरे में भीनी सी
खुशबू फैल गई।

कुछ पल तो मैं अवाक् रही
फिर याद आया
अरे
मेरे आँगन से आ रही है
ये मदमाती गंध
रातरानी के फूलों से!!

“ओ रात की मल्लिका
क्या ख़ूब जलवे हैं तेरे!”

मन ही मन ये कहते हुए
धीरे से मैं
आ के लेट गई पलंग पर…!!

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जीवन बने कल्पवृक्ष तुम्हारा

कल्पवृक्ष बना लो जीवन,
सब की आशा पूर्ण करो!
मित्र को अपने पास तो रखो,
शत्रु को भी ना दूर करो…

चाहे तुम जिस पथ से गुजरो,
प्रेम रस भरपूर भरो;
संगी हो या चाहे शत्रु,
नहीं किसी का अहित करो।

दीप बनाकर अपना जीवन,
जग अंधियारा दूर करो।
बने आदर्श तुम्हारा जीवन,
हे! कर्म तुम ऐसे वीर करो।

महावीर हो तुम, अहो!
देखो ना यूँ अधीर बनो।
कर्म – भूमि है तुम्हारा जीवन
अरे, जगत उद्धार करो।

प्रखर सूर्य बन जाओ, अहो!
विश्व कालिमा दूर करो।
हार ना मानो वीर – प्रवर!
कष्ट जगत के दूर करो।

बना कुटुंब जगत को स्वयं का,
जीव – मात्र कल्याण करो।
कल्पवृक्ष बना लो जीवन,
सब की आशा पूर्ण करो।

कोई बात तो है

आज वो खोये खोये हैं
लगता है ,कोई बात तो है ।
कभी हँसते कभी रोये हैं
लगता है कोई बात तो है ।

कभी दिन ढले पास तो आये ,
और भोर हुए चले जाना ।
कभी दूर कभी पास से हैं ,
जैसे कोई बात तो है ।

कभी वो गुमसुम से बैठे हैं
और कभी मुस्काते हैं ,
पूछूँ तो बताते नहीं हैं
लेकिन कोई बात तो है ।

रोज रात को बैठ सिरहाने
कभी वो मीठी बात करें ,
और कभी फिर सन्नाटा सा
जैसे कोई बात तो है ।

आज फिर जब मैंने पूछा –
“क्या है ? कोई बात तो है ?”
फिर भी नहीं कहा कुछ उसने,
लेकिन कोई बात तो है ।

कई बार था मैंने पूछा ,
आखिर कोई बात तो है ।
आज सुबह थे वो गुमसुम से
पूछा तो बोले – “कुछ नहीं है ।”

लेकिन मैं तो जान चुकी थी –
आखिर कोई बात जो है ।

घंटी का रहस्य

दूर कहीं थी घंटी बजती,
रोज सुबह औ’ शाम को ।
और मैं बैठी सोचा करती,
भर दोपहर रात को ॥

कि वो कहीं एक मंदिर है,
या कोई छोटा स्कूल ?
या फिर कोई जानबूझकर
मुझे चुभोता है यह शूल ?

पास नहीं, पर ज्यादा दूर
नहीं वो मेरे घर से ,
फिर भी मैं थी सोचा करती-
” पहुँचूँ वहाँ पर कैसे ? ”

कुछ न कुछ तो बात है क्योंकि
घंटी कोई बजाता है ।
नहीं तो क्या मेरे कानों को
सब यूँ ही सुनाई दे जाता है ?

वहाँ पर है एक बागीचा
ये बात तो मैं थी जानती,
फिर भी जाने क्यों मैं न थी
वहाँ पे जाना चाहती ?

कोई है मुझको बुला रहा
देकर मधुर वो आवाजें,
या ये कोई धोखा है
जिससे मैं हूँ भरमाई ?

यह मधुर स्वर मेरे कानों को
रोज सुनाई देता है
और मैं रहती हूँ सोचती
ये कौन आवाजें देता है ?

यह तो एक पहेली है ,
मेरे सन्नाटे की सहेली है ।
या कोई जादूगर बैठ वहाँ
रोज वंशी बजाता है ?

एक अनमनी सुबह

एक डोर है मैंने बाँध रखी ,
अपने छोटे से आँगन में।
जिस पर टँगी हैं कुर्तियाँ,
कुछ लाल भी औ’ कुछ नीली भी ॥

और दूर खाट पर पड़ी हुई हैं ,
रंग-बिरंगी चुन्नियाँ।
वहीं सामने तुलसी पर
कुछ अनमनी सी तितलियाँ ॥

कि दूर बाँग दे रहा है, 
जो इक रंग बिरंगा वो मुर्गा।
और गली में खड़ा है चीखता,
मोटे सेठ का इक गुर्गा॥

और दूर कहीं हैं बज रहीं,
मंदिर में मधुर घंटियाँ ।
वहीं वो बच्चा है पीट रहा,
देखो टीन पे डंडियाँ ॥

छत पे है माँ बतिया रही,
अपनी उस सखी – सहेली से।
फिर वहीं कहीं बागीचे में,
हैं दौड़ रही मेरी सखियाँ ॥

क्या भोर है देखो यह आई,
मस्ती का संदेशा लाई।
और दूर कोने में पड़ी हुई,
है रात वो लेती अंगड़ाई ॥

और पीछे की गली में
स्कूल जाते कुछ बच्चे हैं।
जिनके पीठों पर टँगे हुए
कई रंग – बिरंगे बस्ते हैं ॥

है भीड़ तो अब बढ़ने लगी,
हाट और बाजारों में ।
फिर भी न जाने क्यूं अबतक,
मैं हूँ खोई विचारों में ॥

कि देखो कैसी यह सुबह,
है जो अब तो आ गई ।
और मेरे मन के आँगन को,
है जैसे महका गई ॥